भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर भारत के तमिलनाडु प्रांत के कांचीपुरम जिले में स्थित है। यह मंदिर बहुत प्राचीन है और इससे जुड़ी कथाएं बेहद रोचक हैं। इस मंदिर को श्री देवराज स्वामी मंदिर (Shri Devraj Swami Temple) के नाम से भी जाना जाता रहा है। मंदिर भगवान विष्णु जी को समर्पित है जो अथि वरदराजा या वरदराजा स्वामी के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर की विशेषता है कि पूरे विश्व में यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां मंदिर के इष्टदेव 40 वर्षों में एक बार पूजे जाते हैं, क्योंकि 40 साल में एक बार ही भगवान वरदराजा स्वामी की मूर्ति मंदिर परिसर में स्थित पवित्र अनंत सरोवर से बाहर आती है।
वरदराज पेरुमल मंदिर (Varadaraja Perumal Temple) का निर्माण 11वीं शताब्दी के दौरान महान चोल शासकों ने कराया था। इस मंदिर को ध्वस्त करने के लिए कई मुस्लिम शासकों ने आक्रमण किया लेकिन कभी पूर्णत: ध्वस्त नहीं कर पाए। कालांतर में कई हिंदू राजाओं ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। देश ही नहीं, विदेशों तक इस मंदिर को जाना जाता है और लोग दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं। लेकिन कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में अधिकतम 2-3 बार ही इस मूर्ति के दर्शन कर सकता है। चूंकि, मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति का पूजन 40 साल में एक बार ही होता है।
धार्मिक मान्यताओं व इतिहास के आधार पर माता सरस्वती नाराज होकर देवलोक से इस स्थान पर आ गई थीं। इसके बाद जब सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी उन्हें मनाने के लिए आए तो उनको देखकर माता सरस्वती वेगवती नदी के रूप में बहने लगीं। ब्रह्माजी ने इस स्थान पर अश्वमेध यज्ञ करने का निर्णय लिया। उनके यज्ञ का विध्वंस करने के लिए माता सरस्वती नदी के तीव्र वेग के साथ आईं। तब माता सरस्वती के क्रोध को शांत करने के लिए यज्ञ की वेदी से भगवान विष्णु श्री वरदराजा स्वामी के रूप में प्रकट हुए।
कांचीपुरम तीर्थ क्षेत्र में अंजीर के पेड़ों का एक विशाल जंगल था, इसलिए इन्हीं अंजीर के पेड़ों की लकड़ी से देवों के शिल्पकार विश्वकर्मा जी ने श्री वरदराजा की प्रतिमा का निर्माण किया था। अंजीर को ‘अथि’ के नाम से जाना जाता है। इसी वजह से भगवान श्री वरदराजा को ‘अथि वरदराजा’ के रूप में भी जाना जाने लगा। विश्वकर्मा जी ने अथि वरदराजा की 12 फुट की मूर्ति का निर्माण किया था।