सूर्य पुत्र शनिदेव को समर्पित यह मंदिर भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के मुरैना जिले के एंती गांव में एक पहाड़ी पर स्थित है। मान्यतानुसार, यह मंदिर देश का सबसे प्राचीन शनि मंदिर है। इस मंदिर के इतिहास की कड़ी त्रेतायुग से जुड़ती है। मान्यता है, हनुमान जी ने शनि देव को रावण की कैद से छूटाकर यहीं इसी निर्जन स्थान पर छोड़ा था। उसी दिन किसी दैवीय प्रभाव से अंतरिक्ष से कुछ उल्का पिंड गिरे और उन्हीं उल्का से निकली शिला से शनि देव का विग्रह तैयार हुआ। जहां उल्कापिंड गिरे वहां अभी भी गड्डे मौजूद हैं।
कालांतर में राजा विक्रमादित्य ने शनिश्चरा मंदिर (Shanidev Temple Shanichara) का जीर्णोद्धार करवाया। 1808 में तत्कालीन राजा दौलतराव सिंधिया ने मंदिर की व्यवस्था के लिए जागीर लगवाई। फिर आगे चलके इसका प्रबंधन ग्वालियर प्रशासन को सौंप दिया गया। मंदिर के मुख्य पुजारी के अनुसार, तेल चढ़ाने एवं छाया दान करने से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति के साथ साथ उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
शनिदेव से जुड़ी एक और रोचक पौराणिक कथा के अनुसार, शनिदेव ने बताया, जब तक वह लंका में रहेंगे तब तक लंका दहन नहीं होगी। वह इतने दुर्बल हैं कि चलकर लंका से बाहर खुद जा ही नहीं सकते। तब हनुमान जी ने अपनी बुद्धि से शनिदेव को लंकापति रावण के पैरों के नीचे से मुक्त कराया था। कहते हैं हनुमान ने शनिदेव को पूरी ताकत से भारत भूमि की ओर फेंका था, तब वह मुरैना जिले के ऐंती ग्राम के पास पर्वत पर जा गिरे और इसीलिए इस पर्वत को शनि पर्वत नाम से जाना जाता है।
शनिश्चरा पहाड़ी (शनि पर्वत) अपने निर्जन वन और अद्वितीय स्थान के कारण अत्यधिक प्रभावशाली मानी जाती है। मान्यता है कि इस क्षेत्र में कई संतों ने तपस्या की थी और यहां की गुफाओं में भी संतों की साधना का अनुभव किया गया है। इसके अलावा, यह मंदिर तांत्रिक गतिविधियों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो इसे अत्यंत सिद्ध मंदिर बनाता है। शनिदेव की मूर्ति तपस्वी रूप में विराजमान है, जिसमें उनके हाथ में यज्ञोपवीत, नीलमणि और रुद्राक्ष की माला है। यह प्रतिमा शनि देव की तांत्रिक साधना का प्रतीक है, जो इस मंदिर को एक विशेष आध्यात्मिक केंद्र बनाती है।