मां भगवती को समर्पित 51 शक्तिपीठों में से एक यह अलौकिक शक्तिपीठ महाराष्ट्र प्रांत के कोल्हापुर शहर में स्थित है। यहां देवी महालक्ष्मी अपने संपूर्ण स्वरूप में विराजित हैं। पुराणों के अनुसार, देवी सती के अंग और आभूषण जहां जहां गिरे वहां वहां शक्तिपीठ बन गये। इस स्थान पर देवी का त्रिनेत्र गिरा था। देवी ने कौलासुर दैत्य का संहार भी इसी स्थान पर किया था। उस दैत्य के आग्रह पर इस स्थान का नाम ‘करवीर क्षेत्र’ पड़ा जो कालांतर में कोल्हापुर हो गया। इस मंदिर को ‘अंबाजी मंदिर’ नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में कई खूबसूरत खंभे हैं जिनकी कोई गिनती नहीं कर पाता, जिस किसी ने भी गिनने का प्रयास किया उसके साथ कुछ न कुछ अनहोनी जरूर घटित हुई। मान्यतानुसार, महालक्ष्मी के इस स्वरूप के दर्शन करने पर भक्तों के सारे संकट दूर होते हैं।
मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से चालुक्य साम्राज्य से संबंधित है और संभवतः इसे पहली बार 700 ई. में बनाया गया था। पत्थर के चबूतरे पर स्थापित, चार भुजाओं वाली और मुकुटधारी देवी की छवि बलुआ पत्थर से बनी है। काले पत्थर में उकेरी गई महालक्ष्मी की छवि 2 फीट 8.5 इंच ऊंची है। मूर्ति 2000 साल से ज्यादा पुरानी बताई जाती है। मूर्ति में महालक्ष्मी की चार भुजाएं हैं। इनमें महालक्ष्मी मेतलवार, गदा, ढाल आदि शस्त्र हैं। उनके सिर पर गहनों से सजा मुकुट है जिसका वजन करीब 40 किलो है। इनके मस्तक पर शिवलिंग, नाग और पीछे शेर हैं।
मंदिर के मुख्य भाग में महाकाली के सामने एक कोने पर श्री यंत्र उकेरा गया है। मूर्ति के पीछे देवी का वाहन, एक पत्थर का शेर खड़ा है। ये मंदिर काले पत्थरों पर कमाल की नक्काशी हजारों साल पुराने भारतीय स्थापत्य की अद्भुत नमूना है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में महालक्ष्मी हैं। देवी अपने चारों हाथों में अमूल्य वस्तुएं धारण किये हुए हैं। उनके दाएं और बाएं 2 अलग गर्भग्रहों में महाकाली और महासरस्वती के विग्रह हैं। मंदिर की दीवार में श्री यंत्र को पत्थर पर खोद कर बनाया गया है।
कोल्हापुर मंदिर की सबसे अहम बात यह है कि यहां महालक्ष्मी जी के चरणों में खुद सूर्य देवता प्रणाम करते हैं। दरअसल, यहां पश्चिमी दीवार पर एक खिड़की बनी हुई है। जिसके चलते मार्च और सितंबर के महीने की 21 तारीख के आसपास 3 दिनों तक सूर्य की किरणें देवी के चरणों को प्रणाम करती है। ये मंदिर इस मायने में भी दूसरे मंदिरों से अलग है कि जहां अन्य हिंदू मंदिरों में देवी पूरब या उत्तर दिशा की ओर देखते हुए मिलती हैं वहीं इस मंदिर में महालक्ष्मी पश्चिम दिशा की ओर देख रही हैं।
मंदिर में महालक्ष्मी के अलावा नवग्रहों, दुर्गा माता, सूर्य नारायण, भगवान शिव, भगवान विष्णु, विट्ठल रखमाई, तुलजा भवानी आदि देवी देवताओं की मूर्तियां भी हैं। मंदिर परिसर में स्थित मणिकर्णिका कुंड के तट पर विश्वेश्वर महादेव मंदिर की भी काफी प्रसिद्धि है। महालक्ष्मी की पालकी सोने की है। कहते हैं इसमें 26 किलो सोना लगा हुआ है।
कोल्हापुर मंदिर में पहले सिर्फ पुरुषों को ही जाने की इजाजत थी लेकिन काफी संघर्ष के बाद आखिरकार इसमें महिलाओं को भी जाने की इजाजत मिली। पहले तो मंदिर के पुजारी इसके विरोध में थे लेकिन महिलाओं के बढ़ते विरोध और राज्य सरकार के दखल के बाद महिलाओं ने गर्भगृह में प्रवेश कर महालक्ष्मी की पूजा कर महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया।