प्रथम पूज्य भगवान गणेश को समर्पित यह मंदिर भारत के महाराष्ट्र प्रांत के मुंबई शहर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1801 में लक्ष्मण विथु और देउबाई पाटिल ने करवाया था। दंपति के अपने कोई संतान नहीं थी और उन्होंने अन्य बांझ महिलाओं की इच्छाओं को पूरा करने के लिए सिद्धिविनायक मंदिर बनाने का फैसला किया। दिलचस्प बात यह है कि यहां भगवान गणेश की मूर्ति को स्वयंभू माना जाता है और यह सभी इच्छाओं को पूरा करती है। इस मंदिर के मूल रूप का निर्माण 19 नवंबर, 1801 में पूरा हुआ था। मंदिर का जो वर्तमान रूप है उसे 1993 में तैयार किया गया था।
गणेश जी की प्रतिमा में काले रंग के पत्थर का प्रयोग हुआ। प्रतिमा 2.5 फुट लंबी और 2 फुट चौड़ी है। इस मूर्ति में गणेश जी की तुंड दांयी ओर है जो इसे और खास बनाती है। मूर्ति के चार हाथ (चतुर्भुज) हैं, जिसमें ऊपरी दाहिने हाथ में कमल, ऊपरी बाएं हाथ में एक परशु (छोटी कुल्हाड़ी), निचले दाहिने हाथ में पवित्र माला और मोदक से भरा कटोरा है। भगवान गणेश इस मंदिर में अपनी दोनो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि के साथ स्थापित किए गए हैं। पूरे साल गणेश जी के इस स्वरूप के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है।
मान्यतानुसार, इस मंदिर के निर्माण में लगी धनराशि एक किसान महिला देउबाई पाटिल ने दी थी। देउबाई के कोई संतान नही थी, इसीलिए वो चाहती थी कि जो भी महिला इस मंदिर में अपनी पूरी भक्ति और श्रद्धा से आए, गणपति बप्पा उसे ऐसा आशीर्वाद दें कि वो महिला बांझ ना रहे। गणेश जी के इस स्वरूप के दर्शन करने से संतान की लालसा रखने वाले दंपतियों के यहां जल्द किलकारियां गूंजती हैं।