भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिंग भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के प्राचीन शहर उज्जैन में स्थित है। पौराणिक मान्यतानुसार, भगवान शिव ने यहाँ दूषण नामक राक्षस का वध किया था। तदुपरांत भक्तों के अनुरोध पर शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में सदैव के लिए विराजित हो गये। दक्षिणमुखी होने की वजह से यह शिवलिंग और भी विशेष है। शिवलिंग के साथ गर्भगृह में माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की मनमोहक प्रतिमाएं हैं। गर्भगृह में नंदी दीप स्थापित है, जो सदैव प्रज्वलित होता रहता है। गर्भगृह के सामने विशाल कक्ष में नंदी की प्रतिमा विराजित है। प्राचीन समय में पूरे विश्व का समय(काल) का निर्धारण उज्जैन शहर से होता था इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम महाकालेश्वर पड़ा।
महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन सुबह भस्म आरती होती है। इस आरती की खासियत ये है कि इसमें ताजा मुर्दे की भस्म से महाकाल का श्रृंगार किया जाता है। इस आरती में शामिल होने के लिए देश विदेश से लोग आते हैं। शास्त्रानुसार, आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग हैं। मान्यतानुसार, विक्रमादित्य शासनकाल के बाद से यहाँ कोई भी राजा रात्रि शयन करने की हिम्मत नहीं करता। जिसने भी किया उसे संकटों से जूझना पड़ा।
वर्तमान में जो महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है, वह 3 खंडों में विभाजित है। निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर तथा ऊपरी खंड में श्री नागचन्द्रेश्वर मंदिर स्थित है। नागचन्द्रेश्वर शिवलिंग के दर्शन वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन ही करने दिए जाते हैं। उज्जैन के राजा महाकाल बाबा श्रावण मास में प्रति सोमवार नगर भ्रमण करते हैं और अपनी प्रजा को देखते हैं। महाकाल की सवारी में किसी भी प्रकार का नशा करके शामिल नहीं होते हैं। महाशिवरात्रि के दिन समूचा शहर शिवमय हो जाता है। चारों ओर बस शिव जी का ही गुंजन सुनाई देता है। सारा शहर बाराती बन शिव विवाह में शामिल होता है।
ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में (Jyotirling Mahakaleshwar Temple) चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से भगवान महाकाल की दिनचर्या बदलती है। फाल्गुन पूर्णिमा से शरद पूर्णिमा तक छह माह गर्मी के अनुसार भगवान की सेवा पूजा की जाती है। गर्मी के दिनों में राजाधिराज महाकाल को ठंडे जल से स्नान कराया जाता है। वहीं, शरद पूर्णिमा से फाल्गुन पूर्णिमा तक सर्दी के अनुसार पूजन की परंपरा है। सर्दी के दिनों में तड़के 4 बजे भस्म आरती में भगवान को गुनगुने गर्म जल से स्नान कराया जाता है।