श्रीमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्री शैलम

श्रीमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्री शैलम

श्रीमल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्री शैलम: भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले की कृष्णा नदी के किनारे श्रीशैल पर्वत पर स्थित है। पुराणों के अनुसार, इस ज्योतिर्लिंग में माता पार्वती (मल्लिका) और भगवान शिव (अर्जुन) की संयुक्त दिव्य ज्योतियां समाहित है। इस मंदिर को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है। माना जाता है कि जो भक्त इस मंदिर में शिव पूजा करता है, उसे अश्वमेघ यज्ञ से मिलने वाले पुण्य के बराबर पुण्य मिलता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास उस समय से जुड़ा है जब कार्तिकेय और गणेश में बड़ा कौन है को लेकर बहस हुई थी। तब भगवान शिव और माता पार्वती ने दोनों को पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए कहा। जो परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही बड़ा होगा। यह सुनकर कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ हो परिक्रमा के लिए निकल गए। वहीं दूसरी ओर गणेश कुछ विचार करने के बाद माता पार्वती और शिव की 7 परिक्रमा करके उनके सामने खड़े हो गए और विजेता घोषित कर दिए गए।

कार्तिकेय ने लौटकर जब ये सब देखा तो बड़े क्रोधित हो दक्षिण दिशा की ओर इस विशाल क्रोंच पर्वत पर पहुंचे। उन्हें मनाने के लिए माता पार्वती भी पहुंच गईं। उसके बाद भगवान शिव ने यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए। तभी से यह ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ। एक मान्यता ये भी है कि हर अमावस्या पर शिव जी और पूर्णिमा पर देवी पार्वती कार्तिकेय से मिलने श्रीपर्वत पर आती हैं।

मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर (Mallikarjuna Swami Jyotirlinga) के निर्माण और रखरखाव में कई शासकों ने योगदान दिया। हालांकि, इसका पहला रिकॉर्ड 1 ई. में शाथवाहन साम्राज्य (Satavahana Empire) निर्माताओं की पुस्तकों में मिलता है। इसके बाद, इक्ष्वाकु, पल्लव, चालुक्य और रेड्डीज ने भी मंदिर में योगदान दिया, जो मल्लिकार्जुन स्वामी के अनुयायी थे। विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagara Empire) और छत्रपति शिवाजी ने भी क्रमशः मंदिर में सुधार किया। इतिहासकारों के अनुसार, 1667 ई. में गोपुरम का निर्माण कराया गया। हालांकि, मुगल काल में यहां पूजा बंद कर दी गई थी, लेकिन अंग्रेजों के शासन के दौरान इसे फिर से शुरू किया गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद ही यह मंदिर फिर से प्रमुखता में आया।

मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर (Mallikarjun Jyotirlinga) की वास्तुकला की बात करें तो बतादें, यह मंदिर द्रविड़ शैली में बना है। इसकी दीवारें 600 फीट तक ऊंची हैं। दीवारों पर कई अद्भुत मुर्तियां बनी हुई है, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र मानी जाती है। मंदिर अपनी ऊंची मीनारों और खूबसूरत नक्काशी के साथ वास्तुकला का भी अद्भूत एक नमूना है। यह ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है जो इसे मजबूत बनाती हैं। मान्यता है कि देवी पार्वती ने राक्षस महिषासुर से युद्ध किया था और खुद को मधुमक्खी में बदल लिया था। भक्तों का मानना है कि वे अभी भी भ्रमरम्बा मंदिर के एक छेद से मधुमक्खी की भिनभिनाहट सुन सकते हैं।